Monday, September 4, 2017

अमेरिका : डूब-उबरने के दिन

अमेरिका में 'हार्वी' : डूब-उबरने के दिन    - कविता वाचक्नवी



यों तो चक्रवात और उसका ताण्डव समाप्त हो चुका है किन्तु किन्तु अभी भी हजारों परिवार बेघर हैं, उनके घर पानी में डूबे हैं और विपदा से उनकी लड़ाई आगामी 6 माह कम-से-कम और चलनी है। हमारे संस्थान के अध्यापक-अध्यापिकाएँ मिलकर अनेक प्रकार के सेवाकार्यों, उन्हें अस्थाई सुरक्षित आवास उपलब्ध करवाना, दैनिक आवश्यकता का सामान पहुँचाना, शाकाहारी भोजन स्वयम् घरों में बना कर प्रतिदिन उन्हें पहुँचाना, उनके पानी में डूबे घरों की मरम्मत की व्यवस्था, उनके घरों के पुनर्निर्माण में सामग्री, फर्नीचर, बिस्तर आदि क्रय कर देना आदि प्रकार की भागदौड़ में लगे हैं। दानदाताओं से $32000 एकत्र भी किए हैं, हमारा लक्ष्य $50000 का है।

जिन्होंने परिजन-घर और बहुत कुछ खोया है, वह तो नहीं लौटाया जा सकता, किन्तु इस विपदा में पूरे देश का एकजुट सहयोग अनुकरणीय है। ध्यातव्य है कि प्रयोग की हुई वस्तुएँ यहाँ दान में नहीं दी जातीं, जिसे जो देना है वह क्रय कर देना है। रेस्टोरेंट्स, संस्थान, स्टोर्ज़, कम्पनियाँ, व्यापारिक घराने, आम जनता, विद्यालय, विश्वविद्यालय, युवा संगठन, छात्र संगठन, अध्यापक संगठन, कर्मचारी संगठन, आवास संगठन आदि लाखों-लाख संस्थाएँ और संगठन, हाथ का काम करने वाले कामगार और आम जन तक अपनी निःशुल्क सेवाएँ और सहयोग जनता और सरकार को दे रहे हैं। 


कहीं कोई चीख-पुकार, शिकायतों का कोई शब्द, दोषारोपण, तेरा-मेरा, पहले आप, छीना-झपटी, या सरकार भरोसे की स्थित अथवा दृश्य नहीं है। सब शान्ति व सद्भाव से सहयोग एवं सेवा में एकजुट हैं, किसी को सेवा के बहाने अपना या अपनी संस्था का नाम चमकाने में रुचि नहीं। डेढ़-दो लाख से भी बहुत अधिक संख्या में स्वयंसेवक जुटे हुए हैं। कई स्वयंसेवक तो ऐसे हैं, जो स्वयं अपना बहुत कुछ इस आपदा में गँवा चुकने के बाद आँसू छिपाए दूसरों की आँसू पोंछ रहे हैं, सरकारी सहायता भी आई है।

देश ऐसे बनते हैं, जनता से बनते हैं, जनता देश को जैसा चाहे बना सकती है, उसे देश में जो व जैसा परिवर्तन चाहिए वैसा व उस दिशा में स्वयं काम करने लगे..... बस उसी दिन से पुनर्निर्माण एवम् परिवर्तन प्रारम्भ जो जाता है। आरोप, शिकायतें, अपेक्षाएँ, उत्पात, छद्म और स्वार्थ भौगोलिक सीमाओं को #देश होने से रोकते हैं।


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